🔥 Animal Farm 🔥

10 अध्यायों की क्रांति और सत्ता की चौंकाने वाली कहानी!

जॉर्ज ऑरवेल की यह विश्वप्रसिद्ध कृति अब Learnivox पर हिंदी ऑडियोबुक में। आज़ादी, राजनीति और विश्वासघात से भरी यह कहानी समाज का असली चेहरा उजागर करती है और आपको गहराई से सोचने पर मजबूर कर देगी।

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क्या आपने कभी सोचा है कि सत्ता और लालच कैसे इंसान (या जानवर) को बदल देते हैं? Animal Farmसिर्फ़ एक कहानी नहीं है – यह समाज, राजनीति और सत्ता के खेल का आईना है। यह किताब आपको सोचने पर मजबूर करेगी कि असली आज़ादी और बराबरी का मतलब क्या है, और कैसे ताक़तवर लोग अक्सर अपने फ़ायदे के लिए सच्चाई को तोड़-मरोड़ देते हैं।

जॉर्ज ऑरवेल की यह महान रचना साधारण सी फ़ार्म पर आधारित है, जहाँ जानवर इंसानों के ख़िलाफ़ विद्रोह करते हैं। शुरुआत में सब कुछ आदर्श लगता है – सब बराबर हैं, सबके अधिकार समान हैं। लेकिन धीरे-धीरे लालच, धोखा और शक्ति का दुरुपयोग सब कुछ बदल देता है!

यह किताब हमें सिखाती है कि इतिहास हमेशा दोहराया जाता है, और सत्ता का खेल इंसानियत को ग़ुलाम बना सकता है। यह सिर्फ़ जानवरों की कहानी नहीं है – यह हर उस समाज की सच्चाई है जहाँ अन्याय और धोखा छुपा होता है।

"सभी जानवर बराबर हैं, लेकिन कुछ जानवर दूसरों से ज़्यादा बराबर हैं।"
-जॉर्ज ऑरवेल, Animal Farm की कहानियों से प्रेरित

जॉर्ज ऑरवेल: सामाजिक न्याय और अधिनायकवाद पर कलम चलाने वाले ब्रिटिश लेखक की अनोखी कहानी!

Mahesh Dutt Sharma

जॉर्ज ऑरवेल

प्रोमिथियस हॉल ऑफ फेम अवॉर्ड

जन्म और शुरुआती जीवन- भारत की मिट्टी से ब्रिटिश जड़ें: जॉर्ज ऑरवेल का जन्म 25 जून 1903 को मोतिहारी, बिहार (तत्कालीन ब्रिटिश भारत) में हुआ। उनके पिता रिचर्ड वाल्मेस्ले ब्लेयर ब्रिटिश इंडियन सिविल सर्विस में अफीम विभाग के अधिकारी थे, जबकि मां इडा माबेल ब्लेयर फ्रांसीसी मूल की थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति मध्यम थी, और ऑरवेल का बचपन भारत और इंग्लैंड के बीच गुजरा। महज एक साल की उम्र में वे मां के साथ इंग्लैंड लौट आए, जहां हेनली-ऑन-थेम्स में उनका पालन-पोषण हुआ। बचपन से ही ऑरवेल को किताबें पढ़ने का शौक था – वे कीपलिंग और वेल्स जैसे लेखकों से प्रभावित हुए। लेकिन स्कूल में उन्हें क्लास डिविजन का कड़वा अनुभव हुआ, जो बाद में उनके लेखन में सामाजिक असमानता के रूप में उभरा। दिलचस्प बात: मोतिहारी में उनका जन्मस्थान आज भी एक संग्रहालय है, जो उनकी याद में संरक्षित है। बचपन की एक यादगार घटना – वे अक्सर कहानियां गढ़ते और परिवार को सुनाते, जो उनके लेखक बनने की पहली झलक थी।

शिक्षा-ज्ञान का आधार: ऑरवेल की शिक्षा इंग्लैंड के प्रतिष्ठित स्कूलों में हुई। 1911 में वे सेंट साइप्रियन प्रेपरेटरी स्कूल गए, जहां उन्होंने छात्रवृत्ति जीती लेकिन अमीर बच्चों के बीच खुद को 'निचले वर्ग' महसूस किया। 1917 में वे ईटन कॉलेज पहुंचे – ब्रिटेन का सबसे मशहूर स्कूल, जहां वे किंग्स स्कॉलर बने। यहां उन्होंने फ्रेंच, इतिहास और साहित्य पढ़ा, लेकिन पढ़ाई से ज्यादा समाज की असमानताओं पर ध्यान दिया। ईटन के बाद उन्होंने ऑक्सफोर्ड या कैम्ब्रिज जाने की बजाय ब्रिटिश इंडियन पुलिस सर्विस जॉइन की, क्योंकि परिवार की आर्थिक स्थिति यूनिवर्सिटी की फीस नहीं उठा सकती थी। शिक्षा के दौरान उन्होंने "ऐसे दिन" जैसी डायरियां लिखीं, जो बाद में उनके आत्मकथात्मक लेखन की आधार बनीं। ईटन में उनके साथी उन्हें "सनकी" कहते, क्योंकि वे हमेशा सामाजिक मुद्दों पर बहस करते। शिक्षा ने उन्हें किताबी ज्ञान से ज्यादा जीवन का यथार्थ सिखाया – साम्राज्यवाद और वर्ग भेद की कड़वी सच्चाई।

साहित्यिक शुरुआत और चुनौतियां-पत्रकारिता से लेखन तक: 1922 में ऑरवेल बर्मा (अब म्यांमार) में इंडियन इंपीरियल पुलिस में अधिकारी बने। यहां उन्होंने साम्राज्यवाद की क्रूरता देखी – स्थानीय लोगों पर अत्याचार, जो उन्हें अंदर से तोड़ता रहा। 1927 में वे इस्तीफा देकर इंग्लैंड लौटे और लेखक बनने का फैसला किया। शुरुआती साल मुश्किल थे – पेरिस और लंदन में गरीबी में गुजारे, जहां वे डिशवॉशर और ट्यूटर जैसे काम करते। इस दौरान उन्होंने "डाउन एंड आउट इन पेरिस एंड लंडन" (1933) लिखी, जो उनकी पहली किताब थी। 1936 में स्पेनिश गृहयुद्ध में वे रिपब्लिकन पक्ष से लड़े, जहां गले में गोली लगी और वे मौत के मुंह से बचे। यह अनुभव "होमेज टू कैटेलोनिया" (1938) में उतरा। चुनौतियां: गरीबी, स्वास्थ्य समस्याएं (फेफड़ों की बीमारी), और प्रकाशकों के रिजेक्शन। लेकिन 1930 के दशक में उन्होंने "बर्मीज़ डेज़" (1934) जैसी किताबें लिखीं, जो साम्राज्यवाद की आलोचना करती थीं। द्वितीय विश्व युद्ध में वे बीबीसी में काम करते रहे, जहां प्रोपगैंडा के खिलाफ आवाज उठाई। इन चुनौतियों ने उनके लेखन को धार दी – वे कहते थे, "लेखन राजनीतिक है।

प्रमुख रचनाएँ- दुनिया बदलने वाली किताबें:ऑरवेल की पहली किताब "डाउन एंड आउट इन पेरिस एंड लंडन" (1933) गरीबी पर आत्मकथात्मक थी। "बर्मीज़ डेज़" (1934) ने साम्राज्यवाद की आलोचना की, जबकि "द रोड टू विगन पियर" (1937) मजदूरों की दुर्दशा दिखाई। "होमेज टू कैटेलोनिया" (1938) युद्ध की सच्चाई बयां करती है। उनकी मशहूर "एनिमल फार्म" (1945) रूसी क्रांति पर व्यंग्य है, और "1984" (1949) डिस्टोपियन दुनिया की चेतावनी, जहां "बिग ब्रदर" जैसे शब्द दिए। ये किताबें सरल भाषा में गहरे संदेश देती हैं और करोड़ों कॉपियां बिकीं।

लेखन शैली और विषय: हास्य और ज्ञान का संगम:ऑरवेल की शैली सरल, स्पष्ट और व्यंग्यात्मक थी – अनावश्यक शब्दों से परहेज। विषय: अधिनायकवाद, भाषा का दुरुपयोग, सामाजिक अन्याय और स्वतंत्रता। निबंध "पॉलिटिक्स एंड द इंग्लिश लैंग्वेज" (1946) में भाषा को हथियार बताया। उनकी रचनाएं सोचने पर मजबूर करती हैं।

बाद का जीवन और योगदान-बीमारी में सक्रियता: 1940 में सोनिया ब्राउनल से शादी की, बेटा गोद लिया। युद्ध में होम गार्ड में रहे। 1947 में टीबी हुआ, लेकिन "1984" पूरा किया। राजनीतिक बहसों में सक्रिय, कम्युनिज्म की आलोचना की।

पुरस्कार और सम्मान-लेखन की शान: जीवनकाल में कम पुरस्कार, लेकिन बाद में "1984" को प्रोमिथियस अवॉर्ड मिला। टाइम्स ने उन्हें महान लेखकों में शुमार किया। ऑरवेल प्राइज उनके नाम पर है।

मौत और विरासत-अमर चेतावनी: 21 जनवरी 1950 को 46 साल में टीबी से लंदन में निधन। 2025 तक "1984" डिजिटल निगरानी के दौर में प्रासंगिक। फिल्में, नए संस्करण और ऑरवेल डे उनकी याद दिलाते हैं। लाखों युवा प्रेरित होते हैं।

मुख्य रचनाएँ: एनिमल फार्म (1945) और 1984 (1949) शिखर रचनाएं हैं। अन्य: डाउन एंड आउट इन पेरिस एंड लंडन (1933), बर्मीज़ डेज़ (1934), होमेज टू कैटेलोनिया (1938)। ऑरवेल की कहानी सिखाती है, सच्चाई की कलम कभी नहीं रुकती।


10 अध्यायों की क्रांति और सत्ता की चौंकाने वाली कहानी!

हर एपिसोड एक अलग दुनिया है, एक अलग अनुभव है। आइए जानें कि ये कहानियाँ आपके दिल को कैसे छू जाएंगी:

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Green Horse - हरे रंग का घोड़ा

मुख्य विषय: यह एपिसोड अकबर और बीरबल की कहानियों का एक शानदार उदाहरण है, जहाँ असंभव लगने वाली चुनौती को बीरबल ने अपनी बुद्धिमत्ता और हास्य से हल किया। कहानी दिखाती है कि किस तरह तर्क और हाज़िरजवाबी, किसी भी मुश्किल परिस्थिति को मज़ाक में बदल सकती है।

कहानी का सार: एक दिन अकबर अपने बाग़ की हरियाली देखकर बहुत प्रसन्न थे और अचानक उन्होंने बीरबल से कहा कि वह उनके लिए सात दिनों के भीतर एक हरे रंग का घोड़ा लाकर दें। यह आदेश सुनकर दरबारी ख़ुश हो गए, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि इस बार बीरबल बुरी तरह फँस जाएगा। हरे रंग का घोड़ा तो कभी अस्तित्व में ही नहीं था।

पहले छह दिनों तक बीरबल ने कुछ नहीं किया, मानो उन्होंने हार मान ली हो। लेकिन सातवें दिन वह दरबार पहुँचे और अकबर से कहा कि घोड़ा मिल गया है, पर घोड़े के मालिक की दो शर्तें हैं—पहली, अकबर ख़ुद घोड़े को लेने जाएँ और दूसरी, उन्हें घोड़े को लेने के लिए हफ़्ते के सातों दिनों के अलावा किसी और दिन आना होगा। यह उत्तर सुनते ही अकबर ठहाकों से हँस पड़े और बीरबल की बुद्धिमत्ता को मान गए। दरबारी जो बीरबल की हार देखने के लिए उत्साहित थे, वह निराश रह गए।

मुख्य संदेश: असंभव लगने वाली समस्या का भी समाधान हो सकता है, बशर्ते सोच अलग और रचनात्मक हो। हाज़िरजवाबी सिर्फ़ मज़ाक नहीं, बल्कि कठिनाइयों से बाहर निकलने का सबसे प्रभावी साधन है।

भावनात्मक प्रभाव: यह कहानी श्रोताओं को मुस्कुराने के साथ-साथ प्रेरित भी करती है। यह सिखाती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, धैर्य और चतुराई से उनका हल संभव है। बीरबल का शांत और हास्यपूर्ण उत्तर हमें यह याद दिलाता है कि कभी-कभी बुद्धिमत्ता ही सबसे बड़ा हथियार है, जो कठिन से कठिन समस्या को हल्का और मज़ेदार बना देती है।

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Who cooked the khichdi? - खिचड़ी किसने पकाई?

मुख्य विषय: यह एपिसोड सिर्फ़ हास्य या हाज़िरजवाबी नहीं, बल्कि न्याय और सच्चाई का गहरा संदेश देता है। बीरबल ने इस कहानी में अकबर को यह सिखाया कि न्याय केवल नियमों से नहीं, बल्कि समझ, सहानुभूति और विवेक से होता है।

कहानी का सार: अकबर ने चुनौती रखी कि जो व्यक्ति ठंडी यमुना नदी में पूरी रात बिताएगा, उसे इनाम मिलेगा। एक गरीब ब्राह्मण ने अपने भूखे बच्चों के लिए यह चुनौती स्वीकार की और एक दीये की लौ को देखकर पूरी रात सह लिया। लेकिन दरबारियों की चाल और अकबर के अहंकार के कारण ब्राह्मण को धोखेबाज़ कहकर इनाम से वंचित कर दिया गया।

बीरबल को यह अन्याय बर्दाश्त नहीं हुआ। उन्होंने अकबर को सबक सिखाने के लिए खिचड़ी पकाने का नाटक किया—आग नीचे थी और हाँडी बहुत ऊँचाई पर टंगी हुई। जब अकबर ने कहा कि इतनी दूर की आग से खिचड़ी नहीं पक सकती, तब बीरबल ने कटाक्ष किया कि अगर दूर से जलते एक दीये की गर्मी से ब्राह्मण ज़िंदा रह सकता है, तो उनकी खिचड़ी क्यों नहीं पक सकती।

यह सुनकर अकबर को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने तुरंत ब्राह्मण से माफी माँगी और उसे दोगुना इनाम देकर सम्मानित किया।

मुख्य संदेश: न्याय केवल नियमों से नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और निष्पक्षता से होता है। अहंकार इंसान को ग़लत निर्णय लेने पर मजबूर कर देता है। एक सच्चा सलाहकार वही है, जो सही समय पर आपको आपकी ग़लती का एहसास दिला सके।

भावनात्मक प्रभाव: यह कहानी श्रोताओं को गहराई से छूती है। इसमें एक गरीब पिता की मजबूरी, अन्याय का दर्द, और फिर न्याय की जीत को जीवंत तरीके से दिखाया गया है। यह हमें सिखाती है कि कठिन परिस्थितियों में भी आशा और दृढ़ निश्चय हमें संभाल सकते हैं, और नेताओं को अपने निर्णय लेने में हमेशा इंसानियत को प्राथमिकता देनी चाहिए।

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The Mystery of Black Holes - ब्लैक होल्स का रहस्य

मुख्य विषय:: यह एपिसोड क्वांटम मैकेनिक्स और ब्लैक होल्स के रहस्य पर केंद्रित है। स्टीफ़न हॉकिंग ने जब छोटे पैमाने के क्वांटम नियमों को विशाल ब्लैक होल पर लागू किया, तो भौतिकी की दुनिया हमेशा के लिए बदल गई।

कहानी का सार: 20वीं सदी में भौतिकी दो स्तंभों पर खड़ी थी—आइंस्टीन की जनरल रिलेटिविटी, जो ब्रह्मांड की बड़ी संरचना समझाती है, और क्वांटम मैकेनिक्स, जो उप-पारमाणविक दुनिया की अजीबोगरीब सच्चाइयाँ बताती है। लेकिन ये दोनों थ्योरीज़ एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं।

हाइजेनबर्ग के "अनिश्चितता के सिद्धांत" ने दिखाया कि कणों की स्थिति और गति दोनों को एक साथ सटीकता से जानना असंभव है। यही क्वांटम दुनिया का नियम है—यहाँ सब संभावनाओं पर चलता है।

इसी बीच स्टीफ़न हॉकिंग ने 1974 में एक चौंकाने वाली खोज की—ब्लैक होल पूरी तरह काले नहीं होते, वे विकिरण उत्सर्जित करते हैं, जिसे आज "हॉकिंग रेडिएशन" कहा जाता है। इसका मतलब है कि ब्लैक होल धीरे-धीरे अपना द्रव्यमान खोते हैं और एक दिन वाष्पित भी हो सकते हैं। यह पहली बार था जब रिलेटिविटी और क्वांटम मैकेनिक्स को एक साथ लाकर समझाया गया।

मुख्य संदेश: यह एपिसोड हमें दिखाता है कि विज्ञान की सबसे बड़ी खोजें अक्सर तब होती हैं जब हम दो अलग-अलग विचारों को जोड़ने की कोशिश करते हैं। हॉकिंग की खोज ने हमें "Theory of Everything" के एक कदम और क़रीब ला दिया।

भावनात्मक प्रभाव: यह अध्याय विस्मय और रोमांच से भर देता है। ब्लैक होल जैसे डरावने पिंड अब सिर्फ़ विनाश का प्रतीक नहीं रहे, बल्कि वे ज्ञान और खोज की नई रोशनी लेकर आए हैं। यह हमें याद दिलाता है कि इंसान की जिज्ञासा ब्रह्मांड के सबसे अंधेरे कोनों को भी रोशन कर सकती है।

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A Glimpse of the Future - भविष्य की झलक

मुख्य संदेश: यह एपिसोड स्टीफ़न हॉकिंग के सबसे बड़े सवालों और ब्रह्मांड के अंतिम रहस्यों पर केंद्रित है। इसमें समय की दिशा, बिग बैंग से पहले का रहस्य, ब्रह्मांड का भविष्य, टाइम ट्रैवल और “Theory of Everything” जैसी गहरी अवधारणाओं की चर्चा होती है।

कहानी का सार: हॉकिंग हमें बताते हैं कि बिग बैंग से "पहले" का सवाल शायद निरर्थक है, क्योंकि समय की शुरुआत वहीं से होती है। उनके "No-Boundary Proposal" के अनुसार, ब्रह्मांड आत्मनिर्भर है और किसी बाहरी कारण की ज़रूरत नहीं।

भविष्य को लेकर दो संभावनाएँ हैं—Big Crunch (ब्रह्मांड का ढहना) या Big Freeze (हमेशा फैलते रहना)। वर्तमान अवलोकन बताते हैं कि ब्रह्मांड एक ठंडी और अँधेरी अवस्था की ओर जा रहा है। “समय का तीर” हमें दिखाता है कि थर्मोडायनेमिक्स, मनोविज्ञान और ब्रह्मांड का फैलाव—all एक ही दिशा में बहते हैं, अतीत से भविष्य की ओर।

सैद्धांतिक रूप से वर्महोल्स समय और अंतरिक्ष में शॉर्टकट दे सकते हैं, लेकिन हॉकिंग मानते थे कि समय में अतीत की यात्रा असंभव है। अंततः, विज्ञान की सबसे बड़ी खोज होगी—Theory of Everything—जो जनरल रिलेटिविटी और क्वांटम मैकेनिक्स को जोड़कर ब्रह्मांड के हर रहस्य को समझाएगी।

मुख्य संदेश: हॉकिंग का सपना था कि यह थ्योरी सिर्फ़ वैज्ञानिकों के लिए नहीं, बल्कि आम इंसानों के लिए भी समझने योग्य हो। ताकि हर कोई इस सवाल पर विचार कर सके—हम क्यों मौजूद हैं? ब्रह्मांड क्यों मौजूद है?

भावनात्मक प्रभाव: यह एपिसोड गहरी प्रेरणा देता है। यह हमें हमारी सीमाओं का एहसास कराता है, लेकिन साथ ही यह भी दिखाता है कि इंसान की जिज्ञासा अनंत है। सितारों की ओर देखना, सवाल पूछना और जिज्ञासु बने रहना ही हमें महान बनाता है।

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कहानियों के मुख्य विषय और संदेश

माहेश दत्त शर्मा की कहानियां केवल मनोरंजन नहीं हैं - ये जीवन के गहरे सवालों के जवाब तलाशती हैं:

क्रांति की शुरुआत

कहानी में जानवर इंसानों के अत्याचार से तंग आकर विद्रोह करते हैं और खेत पर खुद का शासन बना लेते हैं। यह हिस्सा आज़ादी और बराबरी के सपने को दर्शाता है।

बराबरी का सपना

शुरुआत में सभी जानवर बराबर माने जाते हैं। सब मिलकर काम करते हैं और उम्मीद करते हैं कि अब अन्याय खत्म होगा। यह हिस्सा न्यायपूर्ण समाज की चाहत को दिखाता है।

शक्ति का लालच

जैसे-जैसे समय बीतता है, सुअर धीरे-धीरे बाकी जानवरों पर हुकूमत करने लगते हैं। सत्ता का लालच उन्हें भी वैसा ही बना देता है जैसे पहले इंसान थे।

विश्वासघात और धोखा

जो वादे जानवरों से किए गए थे, वे धीरे-धीरे टूटने लगते हैं। मेहनत करने वाले जानवर धोखे और अन्याय का शिकार हो जाते हैं।

आज़ादी से गुलामी तक

कहानी के अंत तक जानवर फिर से गुलाम बन जाते हैं, बस फर्क इतना है कि अब उनके मालिक इंसान नहीं बल्कि सुअर होते हैं। यह सत्ता के भ्रष्टाचार का गहरा संदेश देता है।

सीख और संदेश

किताब यह सिखाती है कि अगर सत्ता पर निगरानी न हो तो कोई भी नेता तानाशाह बन सकता है। असली बराबरी तभी संभव है जब न्याय और ईमानदारी बनी रहे।

"अगर इंसान सत्ता के नशे में अंधा हो जाए, तो वह जानवर से भी ज़्यादा निर्दयी बन जाता है।"

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

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